Breaking News

दुनिया के लिए बड़ा खतरा! ग्लेशियरों के नीचे दबी हुई है वायरसों की पूरी फौज

 दुनिया के लिए बड़ा खतरा! ग्लेशियरों के नीचे दबी हुई है वायरसों की पूरी फौज





नई दिल्ली 
कोविड-19 महामारी के इस दौर से पूरी दुनिया उबरने की कोशिश कर रही है। यह जानकारी भी बाहर आ चुकी है कि ऐसे बहुत सारे वायरस दुनिया पर कहर ढाने का जैसे इंतजार ही कर रहे हैं। इन वायरसों से निपटने के लिए संपूर्ण वैक्सीन डिवेलप करने की जरूरत समझते हुए उस दिशा में वैज्ञानिक शोध भी शुरू हो चुके हैं। लेकिन ये वायरस आखिर बाहर आने को क्यों कुलबुला रहे हैं? वे जहां हैं, वहीं क्यों नहीं रह सकते? क्या ऐसा कोई तरीका नहीं हो सकता जिससे ये हमसे और हम इनसे न टकराएं? ऐसे कई सवालों के जवाब पाने के लिए मनमोहन सिंह नौला ने बात की माइक्रो बायोलॉजिस्ट सोसाइटी, इंडिया के प्रेजिडेंट डॉ. एएम देशमुख से। प्रस्तुत हैं बातचीत के मुख्य अंश... 

कोरोना वायरस के बाद अब वायरसों की पूरी फौज की चर्चा गर्म है। इसमें कितना दम है? 

ये चर्चा निराधार नहीं है। डर वास्तविक है। अगर हमारी लाइफस्टाइल नहीं बदली तो यकीन मानिए ऐसे एक से एक खौफनाक वायरसों से हमारा पाला पड़ता रह सकता है। 

आखिर ये वायरस कहां हैं और क्यों हमारी दुनिया में आने को बेकरार हैं? 

पहले तो ये बता दूं कि ये आने को बेकरार नहीं हैं बल्कि हम इन्हें आने को मजबूर कर रहे हैं। इनके सोर्स बहुत सारे हो सकते हैं, लेकिन एक बहुत बड़ा स्रोत हैं ग्लेशियर्स, जिनका लगातार पिघलना खतरे को बढ़ाता जा रहा है। ग्लेशियर बर्फ के पिघलने के साथ, सदियों से उनमें दफन वायरस और बैक्टीरिया बाहर आ सकते हैं। 

यानी इंसान और वायरस का साथ छूटने वाला नहीं है... 

दरअसल इंसान और विभिन्न प्रकार के बैक्टीरिया/वायरस सह-अस्तित्व में हैं। हमारे बीच चूहे-बिल्ली का खेल भी लंबे समय से चल रहा है। हम एंटीडॉट्स, मेडिसिन या वैक्सीन विकसित करते हैं और ये सूक्ष्मजीव हमें संक्रमित करने के नए तरीके विकसित कर लेते हैं। अब कोरोना वायरस को ही देख लीजिए, यह कितने स्ट्रेन चेंज कर रहा है म्यूटेशन के जरिए। इसमें सबसे ज्यादा खतरनाक वे वायरस या बैक्टीरिया हो सकते हैं, जो रेसिस्टेंट हो चुके हैं। 

रेसिस्टेंट कैसे हो सकते हैं जबकि एंटीबायोटिक की खोज को 100 साल भी पूरे नहीं हुए हैं?  

वाजिब सवाल है, लेकिन नेचर विष और अमृत दोनों पैदा करती है। एंटीबायोटिक तो पहले से ही नेचर में था। एलेक्जेंडर फ्लेमिंग ने उसे ढूंढ निकाला। वायरस या बैक्टीरिया से लड़ने के लिए नेचर ने भीतर ही भीतर एक सेना भी तैयार की है। इंसान रिसर्च कर रहा है, लेकिन वे जानवर भी जीवित रहते थे जिन्हें बीमारी होती थी। वे इसलिए जीवित रहते थे क्योंकि उनके भीतर रोगों से लड़ने की प्रतिरोधक शक्ति पैदा होती थी। तो प्रकृति में तो यह लड़ाई चल ही रही है हजारों सालों से। 

आप ग्लेशियरों के वायरसों की बात कर रहे थे... 

हां, अलास्का के टुंड्रा क्षेत्र में दफनाए गए शवों में साइंटिस्ट्स को 1918 के स्पेनिश फ्लू वायरस के आरएनए के अवशेष मिले हैं। कई साइंटिस्ट मानते हैं कि चेचक और बुबोनिक प्लेग के संक्रमित अवशेष भी साइबेरियाई बर्फ में दफन हैं। 2015 में साइंटिस्ट टीम ने तिब्बत से दर्जनों अनजाने वायरस समूहों की खोज की। नासा के वैज्ञानिकों ने अलास्का में 30 हजार वर्षों से जमे बैक्टीरिया को अलग करने में कामयाबी हासिल की। सूक्ष्मजीव, जिसे कार्नोबैक्टीरियम प्लीस्टोकेनियम कहा जाता है, उस समय से जमे हुए थे जब वूली मैमथ पृथ्वी पर चलते थे। ऐसे एक नहीं दर्जनों तथ्य हैं जो बताते हैं कि ग्लेशियरों का पिघलना सिर्फ समुद्र का जल स्तर ही ऊंचा नहीं उठा रहा, हमारी मौत के दूतों को हम तक पहुंचाने का भी इंतजाम कर रहा है। 

ये तो बहुत डरावनी बातें हैं। इनसे बचने के कोई उपाय हो सकते हैं? 

बिल्कुल हो सकते हैं। देखिए रिपोर्ट्स बताती हैं कि कोरोना वायरस संक्रमण के दौरान जितने समय तक भी लॉकडाउन रहा, कार्बन डाइऑक्साइड का एमिशन कम हुआ। इसकी वजह से ग्लोबल वॉर्मिंग पर काफी हद तक फर्क पड़ा है। यह इसलिए हुआ कि उस दौरान हमारी गतिविधियां काफी कम हो गई थीं। संयंत्रऔर फैक्ट्रियां बंद थीं, गाड़ियां नहीं दौड़ रही थीं। लेकिन यह तब हुआ, जब हम बहुत मजबूर हो गए। हम कल-कारखाने हमेशा के लिए बंद नहीं कर सकते। गाड़ियां बंद नहीं हो सकतीं। एसी बंद नहीं किए जा सकते। 

लेकिन हमारा इस बात को अपने मन में बैठा लेना जरूर संभव है कि अपनी लाइफ स्टाइल में हम थोड़ा सा बदलाव कर लें, तो हमारी आने वाली पीढ़ी की जिंदगी बेहतर हो सकेगी। मैं समझता हूं, कोरोना वायरस ने हमें एक महत्वपूर्ण सबक सिखाया है कि हम ऐसे हालात के प्रति उदासीन नहीं रह सकते। हमें क्लाइमेट चेंज के कारण ग्लेशियरों का पिघलना रोकने के लिए लगातार प्रयास करना होगा। इस मुद्दे पर बड़े पैमाने पर सामाजिक आंदोलन और सहयोग करने के लिए लोगों को संवेदनशील बनाना होगा। अपनी सरकारों पर वैकल्पिक नीतियों के लिए दबाव डालना होगा। 

बतौर एक्सपर्ट नीतियों और व्यवहार में बदलाव को लेकर आप क्या ठोस सुझाव देंगे? 

चार बहुत छोटी-छोटी, लेकिन जरूरी बातें हैं। पहला, पब्लिक ट्रांसपोर्ट या इको फ्रेंडली ट्रांसपोर्ट पर जोर। व्यक्तिगत स्तर पर सबसे ज्यादा जरूरी है साइकिल चलाना। जहां तक संभव हो, कहीं आने-जाने के लिए हम साइकिल का ही इस्तेमाल करें। दूसरा, बिजली की खपत कम से कम करने का प्रयास करें। जब जरूरत न हो लाइट बंद करने या डिवाइसेज को अनप्लग करने जैसी बातें छोटी लगती हैं, लेकिन अत्यधिक कारगर हैं। तीसरा रियूज, रिसाइक्लिंग पर जोर। और अंत में सबसे महत्वपूर्ण बात, जलवायु परिवर्तन के कारणों और रोकथाम के बारे में अपने आसपास सबको बताना, सचेत करना और सरकार पर ऐसी नीतियों के लिए हर संभव तरीके से दबाव बनाना। 

कोई टिप्पणी नहीं

Not Spam Comments And Social media Share
Thanks for Reading